मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

वहम

बहुत सर्द थी कल की रात...
ख़्यालात भी रजाई में जैसे सिकुड़ से रहें थे...
कोई दस्तक सी सुनाई दी थी ज़हन के दरवाजे पर..
क्या वो तुम थी... शायद नहीं 
वहम  होगा ...हाँ वही होगा... 
फिर आया होगा ठहरने एक रात मेरे छोटे से घर में...
दोस्त है मेरा , पुराना दोस्त...
मिला था मुझे पहली दफा उस रोज़ जब तुम्हे देखा था पहली बार 
नीम वाले नुक्कड़ पर नजरे झुकाये गुजरते हुए... 
तुम्हे याद भी नहीं होगा शायद, पर मैं रोज उस लम्हे को कई बार जीता हूँ...
खैर उस लम्हे से मेरा और इस हसीं वहम  का याराना है...
कभी भी, कहीं भी चला आता है कम्ब्खत ...
ना इसे वक़्त का तकाज़ा है , ना जगह की परवाह...
ना मौसम से रुकता है ना आँधियों ,तूफानों से डरता है...
कभी-कभी सोचता हूँ भाग जाऊँ कहीं इससे दूर...बहुत दूर...
फिर दूसरे ही पल ये भी ख्याल आता है कि माना चलो झूठा है ,जालिम ही सही...
जैसा भी है मेरा अपना तो है...बिल्कुल तुम्हारी तरह...

-हिमांशु राजपूत 

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

अन्नदाता के लिए कुछ अक्षर

काली बदरियों को सूँझी फिर से शरारत
छप्पर गरीब का रात भर आँसू बहाता रहा
रोता रहा उसका छोटा बच्चा भी
शायद भूखा होगा
हाँ शायद भूखा ही होगा
आखिर उसका पिता एक अन्नदाता जो है,
वो अन्नदाता जिसके जयकारे लगते हैं सभाओ में सब नेताओ की
वो अन्नदाता जिसकी चिंता हर सरकार को होती है
वो अन्नदाता जिसकी कहानियाँ अक्सर अख़बारों के काले अक्सर बयां करते हैं...

कितना कुछ होता है उस अन्नदाता के लिए
फिर भी उसका बच्चा रात को भूखा रोता है
शायद नेताओ के भारी वादों का बोझ उसके नाजुक कंधे उठा नहीं सकते
उठा नहीं सकते वो शायद उन नारे के बोझ
जो रैलियों में उसके पिता की महिमा में लगते हैं...

कौन दोषी है और कौन नहीं ?
चिंतन बहुत होता है गरीब के पैसे से आयोजित होने वाले संगोष्ठियों में...
प्रश्न उठते हैं, हल भी दिए जाते हैं
नीतियां भी बनती हैं ,पैकेज भी घोषित होते हैं
कागजों पर आकंडें अच्छे भी दिखाई देते हैं...

पर फिर भी ना जाने क्यों
अखबार सने होते हैं अन्नदाता के खून से
खबरे होतीं हैं उसके कर्ज के बोझ से मर जाने की
उसके रोते -बिलखते बच्चो को पीछे छोड़ जाने की...

आखिर क्यूँ ?
निरुत्तर सा हर कोई है इस छोटे से प्रश्न से..
शायद जवाब भी जानता है, पर देना नहीं चाहता
या फिर अब इस सब से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता...
आखिर अख़बारों में छपी वो आत्महत्याएं कुछ संख्या ही तो होती हैं
वो रोज होतें आत्म दाह मात्र आँकडे ही तो हैं...

छप्पर रोये उसका या रोये भूखा बच्चा
हमे क्या ? हम तो कंक्रीट के घर में महफूज और खुश बैठे हैं
अन्नदाता भूखा मरे तो मरे
हमारे घर में तो पैकिटों में आटा आ ही जाता है... 

अब वो बेफिक्र सुबहें नहीं होती, अब वो रंगीन शामें नहीं होतीं...

मार्बल बिछ गया है अब घर के चबूतरे पर
बारिश पड़ भी जाए तो मिटटी की ख्श्बू नहीं आती...
शाम होते ही बंद हो जाते हैं दरवाजे घर के
शुरू हो जाती हैं रंगा-रंग कहानियाँ टीवी पर,
अब वो बाहरी दलानो में
हुक्के गुड़गुड़ाते बुजुर्गों की बैठकें नहीं होती..

नीम भी अब कुछ तन्हा सा महसूस करता है गाँव के बीच में
सावन आते -जाते हैं,कोई बावँरी सी बाला अब  झूला नहीं डालती...
 नंगे बदन भाग जाते थे बच्चे धान के खेतो में
अभी कुछ दिन पहले की सी ही बात है
मोटा बस्ता कंधे पे टाँगे चले जाते हैं स्कूल में ,
अब बचपन में मासूमियत भरी शरारतें नहीं होतीं....

बेफिक्र जवानी में दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियां लगती थी
कॉलिज, कैंटीन, पड़ोस के नुक्कड़ पे महफिले सजा करती थी
रोजगार की तलाश में वो याराने गैर से हो गए.
अब दोस्त कभी मिल भी जाए तो दिलो की बातें नहीं होतीं...

होते थे बड़ो से पूछके अहम फैसलें घरो के
उनकी बातें अंधेरों में रस्ते दिखा जाती थी
अब उँगलियों के खेल से मिल जाती हैं जानकारियां सभी.
बड़ो से सलाह-मशवरे की बातें नहीं होती...

दिन गुजरते जातें हैं, रातें कटती जाती हैं
अब वो बेफिक्र सुबहें नहीं होती, अब वो रंगीन शामें नहीं होतीं...

-हिमांशु राजपूत (ट्विटर : @simplyhimanshur)





दो पल मुझे सुकूँ के मिले...


रात की गुमशुम सी खामोशियों में
पलकों की दहलीज़ पे बैठे
कुछ झूठे ख्वाब नींद की राह तकते हैं...

मावस की रात के गहन तिमिर में
अंतर्मन के बिछोने पे लेटी
कुछ हसरतें चैन के लम्हों का इन्तजार करती हैं...

खिड़की से दूर कहीं जलती हुई
कोई इच्छाओ की चिता दिखाई देती है....
दिखाई देती है कुछ विदाई माँगती
मासूमियत और थोड़ी सादगी भी ...

ये मैं हूँ यहाँ या कोई उजड़ा
टूटा-फूटा घरौंदा है कोई...
सोचता हूँ तो प्रश्न और भी जटिल
आ खड़े हो जाते हैं...
प्रश्न वो जिन्हे हल करने का
ना होसला है अब मुझमे और नाही वक़्त है मेरे पास...

जिम्मेदारियों की चादर तले
कुछ आरजुओं के तकिये पे सर रखे
सोचता हूँ बस, बस किसी तरह
दो पल सुकूँ के मिले
मिले कुछ ख़्वाब झूठे ही
मिले कुछ हसरतें अधूरी ही
मिले कुछ मासूमियत वापस मेरी
काश !!! काश मिले मुझे दो पल, दो पल मुझे सुकूँ के मिले...

- हिमांशु राजपूत (ट्विटर :@simplyhimanshur)

गुरुवार, 11 जून 2015

तुम जा रही थी

शाम को कमरे के रोशनदान से झाँक के देखा 
शायद तुम मेरी गली से गुजर रही थी... 
चन्दन सा महक रहा था सारा मुहल्ला, 
तुम सावन में कोकिला सी चहक रही थी....

अंधियारे के कैनवास पे तुम्हारे ख्यालों के रंगों से 
मैंने तुम्हारा एक चित्र उकेर दिया... 
देखता हूँ चुपके से एक टक तुम्हे ,
तुम नजरें झुका के धीमे से मुस्कुरा रही  थी ....

शब्दों की निर्झर धारा बही, मैं खुद को भीगो बैठा
लिख दिया तुम्हे पुरानी नोटबुक के आखिरी पन्ने पे... 
 क्या प्यारा भरम है ये मेरे अल्हड़ से दिल का 
तुम जाते-जाते सहेली से मेरी कविता कह रही थी...


मंगलवार, 26 मई 2015

ट्विटर के गलियारे से.…

इस पोस्ट के द्वारा ट्विटर पे लिखे गए अपने कुछ सूक्ष्म-काव्य आप लोगो के साथ साँझा कर रहा हूँ। बहुत सारे मित्रों ने, जो कि ट्विटर पर सक्रिय नहीं हैं, मुझसे आग्रह किया था कि मैं अपने कुछ ट्वीट उनके साथ साँझा करूँ। अपने मित्रों की फरमाइश को ध्यान में रखते हुए ये पोस्ट सभी हिंदी प्रेमियों को समर्पित करता हूँ. आशा है कि आप सभी को पसंद आयेगा।





























































मेरे नवीनतम ट्वीट्स के लिए @simplyhimanshur पर मुझे फॉलो कर सकते हैं, मेरे पुराने ट्वीट्स के संग्रह के लिए आप @himanshuarchive को फॉलो कर सकते हैं।