गुरुवार, 17 सितंबर 2015

अब वो बेफिक्र सुबहें नहीं होती, अब वो रंगीन शामें नहीं होतीं...

मार्बल बिछ गया है अब घर के चबूतरे पर
बारिश पड़ भी जाए तो मिटटी की ख्श्बू नहीं आती...
शाम होते ही बंद हो जाते हैं दरवाजे घर के
शुरू हो जाती हैं रंगा-रंग कहानियाँ टीवी पर,
अब वो बाहरी दलानो में
हुक्के गुड़गुड़ाते बुजुर्गों की बैठकें नहीं होती..

नीम भी अब कुछ तन्हा सा महसूस करता है गाँव के बीच में
सावन आते -जाते हैं,कोई बावँरी सी बाला अब  झूला नहीं डालती...
 नंगे बदन भाग जाते थे बच्चे धान के खेतो में
अभी कुछ दिन पहले की सी ही बात है
मोटा बस्ता कंधे पे टाँगे चले जाते हैं स्कूल में ,
अब बचपन में मासूमियत भरी शरारतें नहीं होतीं....

बेफिक्र जवानी में दोस्तों के साथ चाय की चुस्कियां लगती थी
कॉलिज, कैंटीन, पड़ोस के नुक्कड़ पे महफिले सजा करती थी
रोजगार की तलाश में वो याराने गैर से हो गए.
अब दोस्त कभी मिल भी जाए तो दिलो की बातें नहीं होतीं...

होते थे बड़ो से पूछके अहम फैसलें घरो के
उनकी बातें अंधेरों में रस्ते दिखा जाती थी
अब उँगलियों के खेल से मिल जाती हैं जानकारियां सभी.
बड़ो से सलाह-मशवरे की बातें नहीं होती...

दिन गुजरते जातें हैं, रातें कटती जाती हैं
अब वो बेफिक्र सुबहें नहीं होती, अब वो रंगीन शामें नहीं होतीं...

-हिमांशु राजपूत (ट्विटर : @simplyhimanshur)





3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद व आभार आपका

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  2. I definitely comply with some points that you just have mentioned on this post. I appreciate that you just have shared some reliable recommendations on this review.

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